Sunday, September 2, 2018

-----*श्री चैतन्य महाप्रभु जी की बाल लीला*-------

--------*श्री चैतन्य महाप्रभु जी की बाल लीला*-------

निमाई अभी बहुत छोटे है।एकदिन माता ने निमाई को उबटन लगाकर खूब नहलाया।तेल लगाकर छोटे छोटे घुंघराले बालों को कंघी से साफ किया।हाथ के कडूलों को मिट्टी से घिसकर चमकीला किया।कमर में करधनी पहनाई,उसे एक काले डोरे से बांध भी दिया।पैरों में छोटे छोटे कडुले पहनाए।कंठ में कठुला पहनाया।बड़ी बड़ी कमल सी आंखों में काजल लगाया।बायीं ओर मस्तक पर एक काला टिप्पा लगा दिया,जिससे बच्चे को नज़र न लग जाए।माता उस अपूर्व सौंदर्य माधुरी का पान करते करते अपने आप को भूल गई।इतने में विश्वरूप ने आकर कहा-"माँ!अभी भात नही बनाया?"।कुछ झूठी व्यग्रता और रोब दिखाते हुए माँ ने कहा-"तेरे इस छोटे भाई से मुझे फुरसत मिले तो भात बनाऊ।ऐसा नटखट है कि तनिक आंख बचते ही घरसे बाहर हो जाता है"।विश्वरूप ने कहा-"अच्छा ला, इसे मैं खेलाता हूं।तू तबतक जल्दीसे रन्धन कर"।यह कहकर विश्वरूप ने बालक निमाई को गोद मे ले लिया।माता तो दाल चावल बनाने में व्यस्त हो गई,और विश्वरूप धूप में बैठ गया।भला विश्वरूप जैसा विद्याव्यासंगी बालक खाली कैसे बैठता।वो निमाई के पास बैठ पुस्तक पढ़ने लगा।पुस्तक पढ़ते पढ़ते तन्मय हो गया।अब निमाई को किसका भय?धीरे से रेंग रेंगकर आप आंगन के दूसरी ओर एकांत में जा पहुंचे।वहां पर एक बड़भागी सर्पदेवता बैठे हुए थे।बस निमाई को एक नूतन खिलौना मिल गया।वे उनके साथ खेलने लगे।माता रन्धन कर रही थी पर मन निमाई की ओर था।थोड़ी देर तक जब भाइयों की कोई बातचीत न सुनी उन्होंने वहीं से पूछा-"विश्वरूप!निमाई सो गया क्या?"।चौंक कर पुस्तक से सिर उठाकर देखा तो निमाई कहीं नही।बोला-"अम्मा!निमाई निमाई यहां तो नही"।दाल भात वहीं छोड़ माता बाहर भागी।मां बेटे निमाई को ढूंढने लगे।आंगन के दूसरी ओर जो देखा उसे देखकर माता ने चीत्कार मारी।सभी स्त्री पुरुष आवाज़ सुन आ गए,सबके तो होश उड गए।सबने देखा निमाई का आधा शरीर धूल धूसरित,बालों में भी कुछ धूल लगी।सुवर्ण सा शरीर।सर्प गुडमूड़ी मारे बैठा और निमाई उसपर सवार।गौ खुर के निशान युक्त फन उठा रखा है।निमाई का एक हाथ फन के ऊपर।एक से ज़मीन छू रहे।एक पैर में वलय देकर सांप चुपचाप पड़ा है।सूर्य के प्रकाश में काला स्याह शरीर चमक रहा।निमाई हंस रहे हैं।हंसने से सामने के नए नए दाँत खूब चमक रहे हैं।किसी में हिम्मत नही बच्चे को सांप से छुड़ाए ।शची माता आगे बढ़ी।सांप जल्दीसे बिल में घुस गया।निमाई हंसते हंसते माता की ओर आए।मां ने बालक को छाती से चिपटा लिया उस अनंद का वर्णन भला कौन कर सकता है।

श्री भक्तमाल कथा

श्री भक्तमाल कथा

श्री सम्प्रदाय के एक महान् गुरुभक्त संत हुए है श्री गंगा धराचार्य जी , जिनकी गुरु भक्ति के कारण इनका नाम गुरुदेव ने श्री पादपद्माचार्य रख दिया था । श्री गंगा जी के तट पर इनके सम्प्रदाय का आश्रम बना हुआ था और अनेक पर्ण कुटियां बनी हुई थी । वही पर एक मंदिर था और संतो के आसन लगाने की व्यवस्था भी थी । स्थान पर नित्य संत सेवा , ठाकुर सेवा और गौ सेवा चलती थी । एक दिन श्री गंगाधराचार्य जी के गुरुदेव को कही यात्रा पर जाना था । कुछ शिष्यो को छोड़ कर अन्य सभी शिष्य कहने लगे – गुरुजी ! हमे भी यात्रा पर जाने की इच्छा है । कुछ शिष्य कहने लगे – गुरुजी ! आप हमें कभी अपने साथ यात्रा पर नही ले गए , हमे भी साथ चलना है । श्री गंगाधराचार्य जी गुरुदेव के अधीन थे । वे कुछ बोले नही , शांति से एक जगह पर खड़े थे ।

अब गुरुजी ने देखा कि सभी शिष्य यात्रा पर चलना चाहते तो है परंतु आश्रम में भगवान् ,गौ और संत सेवा करेगा कौन और अन्य व्यवस्था देखेगा कौन ? गुरुदेव ने श्री गंगाधराचार्य जी को अपने पास बुलाया और कहा – मै कुछ समय के लिए यात्रा पर जा रहा हूं । आश्रम की संत ,गौ और भगवत् सेवा का भार अब तुमपर है । श्रद्धा पूर्वक आज्ञा का पालन करो , हमे तुमपर पूर्ण विश्वास है । श्री गंगाधराचार्य जी ने प्रणाम किया और कहा – जो आज्ञा गुरुदेव । गुरुदेव जब जाने लगे तब श्री गंगाधराचार्य जी के मुख पर कुछ उदासी उन्हे दिखाई पड़ी । गुरुदेव ने कहा – बेटा ! तुम्हारे मुख मंडल पर प्रसन्नता नही दिखाई पड़ती , क्या तुम हमारी आज्ञा से प्रसन्न नही हो ?

श्री गंगाधराचार्य जी ने कहा – गुरुदेव भगवान् आपकी आज्ञा शिरोधार्य है परंतु जब मै आपकी शरण मे आया था तब मैंने यह प्रतिज्ञा की थी कि मै नित्य ही आपका चरणामृत ग्रहण और आपका दर्शन किये बिन कोई अन्न- जल ग्रहण नही करूँगा । गुरुदेव ने कहा – कोई बात नही , श्री गंगा जी को आज से मेरा ही स्वरूप जानकर इनका जल ग्रहण करो और दर्शन करो । गुरु भी पतित को पावन बनाते है और गंगा जी भी पतित को पावन बनाती है । श्री गंगाधराचार्य जी ने कहा – जो आज्ञा गुरुदेव और चरणों मे प्रणाम किया । अपनी अनुपस्थिति मे अपने समान गंगा जी को मानने का उपदेश देकर चले गये । गंगाधराचार्य नित्य गुरूवत् गंगा जी की उपासना करने लगे । नित्य आश्रम में गौ , संत , ठाकुर सेवा उचित प्रकार से करते थे । अतिथियों का सत्कार और प्रसाद बनाना , स्वच्छता आदि सब कार्य अकेले ही करते थे ।

प्रातः काल श्री गंगा जी का दर्शन करते और गंगा जल गुरुदेव का चरणामृत समझकर ग्रहण करते थे । आरती करते और दण्डवत् प्रणाम निवेदन करते । अन्य कोई शिष्य श्रद्धा पूर्वक स्नान करते थे परंतु पादपद्म जी हृदय से ही श्री गंगा जी की वन्दना पूजा करते थे । गंगा जी को गुरुदेव का स्वरूप समझते थे और गुरुदेव के शरीर पर चरण कैसे पधरावें ? इससे तो पाप लगेगा यह सोचकर कभी भी गंगाजी मे स्नान नही करते थे । इनके हृदय के भाव को न जानकर दूसरे लोग आलोचना करते थे । अन्य शिष्य गंगाधराचार्य जी की बहुत प्रकार से निंदा करते हुए कहते थे – गुरुजी बाहर क्या चले गए , इसने तो गंगा स्नान करना बंद कर दिया । जाकर कुँए पर स्नान करता है ।

कुछ दिनो के पश्चात् श्री गुरुदेव जी लौटकर आये और अपना आसान आश्रम में रखा । अभी गुरुजी को आये कुछ ही देर हुई थी कि गंगाधराचार्य जी की निंदा करने के लिए कुछ शिष्य पहुंच गए । कुछ शिष्य जो आश्रम में ही रुके थे ,उन्होंने गुरुजी से कहा – गुरुजी ! गंगाधराचार्य जी ने आपके यात्रा पर जाने के बाद गंगा स्नान करना त्याग दिया , पड़ा प्रमादी है यह तो । श्री गुरुदेव कुछ नही बोले और श्री गंगाधराचार्य जी भी मौन खड़े रहे । गुरुदेव अच्छी तरह से गंगाधराचार्य जी की गुरुनिष्ठा के विषय मे जानते थे परंतु उन्हें उनकी गुरुभक्ति संसार मे प्रकट करनी था । अगले दिन प्रातः काल इनकी गुरूवाक्य और गुरु निष्ठा का परिचय प्रकट करने का निश्चय गुरुदेव ने किया ।

गुरुदेव ने अपने अन्य शिष्यों सहित गंगाधराचार्य जी को स्नानार्थ श्री गंगा जी की ओर चलने को कहा । गुरुदेव गंगाधराचार्य जी से बोले – बेटा ! हम स्नान करने जा रहे है , तुम मेरे कमंडल अचला और लंगोटी लेकर पीछे पीछे चलो । गुरुदेव गंगा जी में स्नान करने उतरे और थोड़ी देर बाद श्री गंगा धराचार्य जी से कहा – हमारा अचला लंगोटी और कमंडल यहां हमारे पास लेकर आओ । अब गंगा धराचार्य जी धर्म संकट में पड़ गए । वे सोचने लगे – श्री गंगा जी हमारे गुरुदेव का स्वरूप है , गंगा जी मे चरण रखना गुरु का अपमान होगा और यहां प्रत्यक्ष गुरुदेव आज्ञा दे रहे है । अब तो श्री गंगा जी और गुरुदेव ही हमारे धर्म की रक्षा करेगी । इस गुरुनिष्ठ शिष्य की मर्यादा और गुरु भक्ति की रक्षा करने हेतु श्री गंगा जी ने वहां अनेक विशाल कमलपुष्प उत्पन्न कर दिए ।

गुरुदेव ने उन कमलपुष्पो पर पैर रखते हुए चलकर शीघ्र अचला ,लंगोटी और कमंडल लेकर आने को कहा । उन्हीपर पैर रखते हुए ये गुरुदेव के समीप दौडकर गये । श्री गंगाधराचार्य जी का जो प्रभाव गुप्त था, वह उस दिन प्रकट हो गया, इस दिव्य चमत्कार को देखकर सभो के मन मे गंगा जी और पादपद्म जी मे अपार श्रद्धा हो गयी । गुरुजी ने कहा – बेटा धन्य है तुम्हारी गुरुभक्ति जिसके प्रताप से गंगा जी ने यह कमलपुष्प उत्पन्न कर दिए । संसार मे आज के पश्चात तुम्हारा नाम पादपद्माचार्य के नाम से प्रसिद्ध होगा । उसी दिन से गंगाधराचार्य जी का का नाम पादपद्माचार्य पड गया ।


*अन्त सुधारना है तो स्मरण मत छोडो



*अन्त सुधारना है तो स्मरण मत छोडो*

दशरथ जी का मरण सुधर गया,क्योकि वे कैकयी जी के महलों से निकलकर कौसल्या जी के महलों में आ गए.

और इसलिए भी मरण सुधरा अंत समय में राम राम ही कह रहे है,क्योकि जिसके जीवन और जवानी सद गए उसका मरण भी सद जाता है.

इसलिए व्यक्ति अंतिम समय के लिए न बैठा रहे कि अंतिम समय में भगवान याद आ जायेगे, कभी नहीं आयेगे.

जिसे जीवन भर याद नहीं किया अंतिम समय में कैसे याद आ जायेगे,जीवन भर जिसे याद किया वही संसार अंतिम समय याद आएगा.

यहाँ एक चीज समझने की है कि “संसार” और “जगत” में बहुत अंतर है.जगत वह है

जो हमें दिखायी देता है,जो सुन्दर होता है,जिसे भगवान ने बनाया है फूल पत्ती,नदी पर्वत,ये जगत है.

संसार भगवान ने नहीं बनाया है संसार बनाया है हमने, वो भी अपने अन्दर, जो दिखायी नहीं देता,

जो कुरूप होता है,भयानक होता है,क्या है ये संसार?हम और कैसे जिए,

जितना पैसा है और कैसे आये,हमारे मन की कल्पना का नाम संसार है.

पति, पत्नी, बच्चे, घर, परिवार, ये संसार नहीं है,एक भिखारी होता है जिसके पास ये सब कुछ नहीं है तो क्या वह मुक्त है?

नहीं है क्योकि उसके अन्दर इन सबको पाने की जो इच्छा है,जिसे पाने के लिए मन कल्पनाओ में लगा रहता है, उसी का नाम संसार है.

संत कहते है कि चार चीजे व्यक्ति को स्वयं करनी होती है.

१.वरण
२.मरण
३.भजन
४.भोजन

१. वरण –जब व्यक्ति का विवाह होता है तो उस समय वह अपने किसी सगे सम्बन्धी या भाई से नहीं कह सकता कि तुम मेरी जगह विवाह या वरण कर लो उसे स्वयं ही करना होता है.

२.मरण –  मृत्यु आती है तो व्यक्ति को स्वयं ही मरना पडता है उस समय अपने नौकर से नहीं कह सकता कि तु मेरी जगह मर जा उसे ही मरना पड़ेगा.

मरण को सुधारने का एक ही रास्ता है – “स्मरण” व्यक्ति हर पल भगवान का स्मरण करता रहे.

मरण अपने आप सुधर जायेगा.राजा ने यही किया अंतिम समय में राम राम कह रहे है और नैनों में राम की ही छवि है.

३. भजन –  भजन भी स्वयं ही करना पड़ेगा,जो करेगा उसी को परमात्मा मिलेगा,

वहाँ भी आपकी जगह कोई दूसरा नहीं कर सकता.भजन चाहे जैसा करो, जैसे छोटा बालक होता है

जिसको अभी बोलना भी नहीं आता,उसकी बोली भले ही किसी की समझ में ना आये परन्तु माँ की समझ में आ जाती है,

इसी प्रकार हम भजन कैसा भी करे वाणी भी ठीक न हो तो भी परमात्मा समझ लेते है कि हम क्या कहना चाहते है.

४.भोजन –  हजार काम छोड़कर भी व्यक्ति को भोजन भी स्वयं ही करना पड़ेगा किसी दूसरे के खाने से उसका पेट थोड़ी ही भर जायेगा.

राजा दशरथ अंतिम समय में श्रवण के अंधे माता पिता का श्राप याद कर रहे है, उन्होंने जान-बूझकर श्रवण को नहीं मारा था.

दशरथ जी का प्रसंग हमें शिक्षा देता है कि अनजाने में किया पाप जब इतना दंड देता है

तो हम तो जान बूझकर जाने कितने पाप करते रहते है तो उसका कितना दंड होगा.?

राम द्वारे जो मरे फिर न मरना होय

इस संसार में कोई रोग से मर रहा है,कोई भोग से मर रहा है,कोई लोभ से मर रहा है,

कोई चोरी करते मर रहा है,मरता तो हर कोई है, पर कहते है  “अंत भला सो सब भला”.

जिसका मरना अच्छा हो गया उससे जीवन में यदि गलतियां भी हुई है तो भी कुछ नहीं बिगड़ा.मरना तो उसका सफल है जो भगवान के विरह में मरा.

“मरना मरना भांति है ,जाने विरला कोय ,राम द्वारे जो मरे,फिर न मरना होय”

दशरथ जी कह रहे है –

“सो सुत बिछुरत गए न प्राना ,को पापी बड मोहि समाना”

अर्थात –  राम के बिछुड जाने पर भी मेरे प्राण नहीं गए,मेरे समान बड़ा पापी कौन होगा?

भगवान राम के विरह में दशरथ जी का विरह बड़ा उत्कट है जहाँ राम के वियोग में प्राण कंठ तक आ गए,

निकलते इसलिए नहीं कि अभी सुमंत्र वापस नहीं आये,सुमंत्र आ जाए शायद उनके साथ राम सीता भी आ जाए और मेरे जाते प्राण भी लौट आये.

उस समय एक रात भी युगों के समान बीती.विरह हो तो ऐसा जहाँ हर पल युगों सा लगे.

“राम रहित धिग जीवन आसा,सो तनु राखि करब मै कहा,जेहिं न प्रेम पनु मोर निबाहा”

अर्थात - उस जीवन को धिक्कार है जो मुझे राम के बिना जीना पड़े मै उस शरीर को रखकर क्या करूँगा जिसने मेरा प्रेम का प्रण नहीं निबाहा.

“हा रघुनन्दन प्रान पिरीते , तुम्ह बिनु जिअत बहुत दिन बीते ”

हा रघुनंदन ! प्राण प्यारे! तुम्हारे बिना जीते हुए मुझे बहुत दिन बीत गए,

“राम राम कहि राम कहि राम राम कहि राम

तनु परिहरि रघुबर बिरहँ राउ गयउ सुरधाम”

राम राम कहकर फिर राम कहकर फिर राम राम कहकर और फिर राम कहकर श्री राम के विरह में शरीर त्याग दिया.

विरह यदि हो तो दशरथ और कुन्ती जैसा हो, जिन्होंने भगवान के विरह में प्राण ही त्याग दिए.

ऐसा विरह जैसे मछली बिना पानी के जीवित ही नहीं रह सकती,ऐसे प्राण अपने प्रेमी के विरह में तड़प रहे है.

वास्तव में विरह यही है जहाँ भगवान के विरह में भक्त, प्रेमी जीवन,शरीर रखता ही नहीं.

प्यारे तुम्हारे बिना हमने बहुत जी लिया,अब और नहीं जीना है.”वि” “रह” आपके बिना नहीं रह सकते.प्रेमी विरह में शरीर छोड़ने को है और कहता क्या है  –

“ कागा सब तन खाइयो, मोरा चुन-चुन खायो मास रे,

 ये दो मेरे नैना मत खाइयो, इनमे मेरे कृष्ण मिलन की आस रे

 खुसरो बाजी प्रेम की, मै खेलू पी के संग, जीत गयी तो पी मेरे,

 और हार गयी तो मै पी के संग”   

मरने के बाद मेरे ये नैन खुले रह जायेगे क्योकि इनमे मेरे खुदा से मिलने की आस है मरने के बाद कागा मेरे मास को लोच कर खा जाना पर ये दो नैना मत खाना.

इसलिए कहता है. कृष्ण बिना तो हम अब जी नहीं सकते और मरने के बाद वे आये तो उन्हें दुःख होगा,

और अपने प्रेमी को मै कैसे दुखी देख सकती हूँ , इसलिए कम से कम मेरी खुली आँखों को देखकर हम दोनों को राहत मिलेगी
                       

  

*विवाह संस्कार के सात वचन

*विवाह संस्कार के सात वचन*

🌹 *पहला वचन*  🌹

तीर्थव्रतोद्यापनयज्ञ दानं मया सह त्वं यदि कान्तकुर्या:।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं जगाद वाक्यं प्रथमं कुमारी।।

इस श्लोक के अनुसार कन्या कहती है कि स्वामि तीर्थ, व्रत, उद्यापन, यज्ञ, दान आदि सभी शुभ कर्म तुम मेरे साथ ही करोगे तभी मैं तुम्हारे वाम अंग में आ सकती हैं अर्थात् तुम्हारी पत्नी बन सकती हूं। वाम अंग पत्नी का स्थान होता है।

🌹 *दूसरा वचन*  🌹

हव्यप्रदानैरमरान् पितृश्चं कव्यं प्रदानैर्यदि पूजयेथा:।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं जगाद कन्या वचनं द्वितीयकम्।।

इस श्लोक के अनुसार कन्या वर से कहती है कि यदि तुम हव्य देकर देवताओं को और कव्य देकर पितरों की पूजा करोगे तब ही मैं तुम्हारे वाम अंग में आ सकती हूं यानी पत्नी बन सकती हूं।

🌹 *तीसरा वचन* 🌹

कुटुम्बरक्षाभरंणं यदि त्वं कुर्या: पशूनां परिपालनं च।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं जगाद कन्या वचनं तृतीयम्।।

इस श्लोक के अनुसार कन्या वर से कहती है कि यदि तुम मेरी तथा परिवार की रक्षा करो तथा घर के पालतू पशुओं का पालन करो तो मैं तुम्हारे वाम अंग में आ सकती हूं यानी पत्नी बन सकती हूं।

🌹 *चौथा वचन* 🌹

आयं व्ययं धान्यधनादिकानां पृष्टवा निवेशं प्रगृहं निदध्या:।।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं जगाद कन्या वचनं चतुर्थकम्।।

चौथे वचन में कन्या वर से कहती है कि यदि तुम धन-धान्य आदि का आय-व्यय मेरी सहमति से करो तो मैं तुम्हारे वाग अंग में आ सकती हैं अर्थात् पत्नी बन सकती हूं।

🌹 *पांचवां वचन* 🌹

देवालयारामतडागकूपं वापी विदध्या:यदि पूजयेथा:।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं जगाद कन्या वचनं पंचमम्।।

पांचवे वचन में कन्या वर से कहती है कि यदि तुम यथा शक्ति देवालय, बाग, कूआं, तालाब, बावड़ी बनवाकर पूजा करोगे तो मैं तुम्हारे वाग अंग में आ सकती हूं अर्थात् पत्नी बन सकती हूं।

🌹 *छठा वचन* 🌹

देशान्तरे वा स्वपुरान्तरे वा यदा विदध्या:क्रयविक्रये त्वम्।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं जगाद कन्या वचनं षष्ठम्।।

इस श्लोक के अनुसार कन्या वर से कहती है कि यदि तुम अपने नगर में या विदेश में या कहीं भी जाकर व्यापार या नौकरी करोगे और घर-परिवार का पालन-पोषण करोगे तो मैं तुम्हारे वाग अंग में आ सकती हूं यानी पत्नी बन सकती हूं।

🌹 *सातवां और अंतिम वचन* 🌹

न सेवनीया परिकी यजाया त्वया भवेभाविनि कामनीश्च।
वामांगमायामि तदा त्वदीयं जगाद कन्या वचनं सप्तम्।।

इस श्लोक के अनुसार सातवां और अंतिम वचन यह है कि कन्या वर से कहती है यदि तुम जीवन में कभी पराई स्त्री को स्पर्श नहीं करोगे तो मैं तुम्हारे वाम अंग में आ सकती हूं यानी पत्नी बन सकती हूं।

शास्त्रों के अनुसार पत्नी का स्थान पति के वाम अंग की ओर यानी बाएं हाथ की ओर रहता है। विवाह से पूर्व कन्या को पति के सीधे हाथ यानी दाएं हाथ की ओर बिठाया जाता है और विवाह के बाद जब कन्या वर की पत्नी बन जाती है जब वह बाएं हाथ की ओर बिठाया जाता है।

*माथे पर कुमकुम का तिलक* महिलाएं एवं पुरुष माथे पर कुमकुम या तिलक लगाते हैं। वैज्ञानिक तर्क-

*माथे पर कुमकुम का तिलक*

महिलाएं एवं पुरुष माथे पर कुमकुम या तिलक लगाते हैं।

वैज्ञानिक तर्क-

आंखों के बीच में माथे तक एक नस जाती है। कुमकुम या तिलक लगाने से उस जगह की ऊर्जा बनी रहती है। माथे पर तिलक लगाते वक्त जब अंगूठे या उंगली से प्रेशर पड़ता है, तब चेहरे की त्वचा को रक्त सप्लाई करने वाली मांसपेशी सक्रिय हो जाती है। इससे चेहरे की कोश‍िकाओं तक अच्छी तरह रक्त पहुंचता है.
[‬: *सूर्य नमस्कार*

हिंदुओं में सुबह उठकर सूर्य को जल चढ़ाते हुए नमस्कार करने की परम्परा है।

वैज्ञानिक तर्क-

पानी के बीच से आने वाली सूर्य की किरणें जब आंखों में पहुंचती हैं, तब हमारी आंखों की रौशनी अच्छी होती
🌺दीपक के ऊपर हाथ घुमाने का वैज्ञानिक कारण🌺*

दीपक के ऊपर हाथ घुमाने का वैज्ञानिक कारण
आरती के बाद सभी लोग दिए पर या कपूर के ऊपर हाथ रखते हैं और उसके बाद सिर से लगाते हैं और आंखों पर स्पर्श करते हैं। ऐसा करने से हल्के गर्म हाथों से दृष्टि इंद्री सक्रिय हो जाती है और बेहतर महसूस होता है।
🌺परिक्रमा करने के पीछे वैज्ञानिक कारण🌺*

परिक्रमा करने के पीछे वैज्ञानिक कारण
हर मुख्य मंदिर में दर्शन करने और पूजा करने के बाद परिक्रमा करनी होती है। परिक्रमा 8 से 9 बार करनी होती है। जब मंदिर में परिक्रमा की जाती है तो सारी सकारात्मक ऊर्जा, शरीर में प्रवेश कर जाती है और मन को शांति मिलती है।
‬: *🌺चप्पल बाहर क्यों उतारते हैं ?🌺*

चप्पल बाहर क्यों उतारते है ?
मंदिर में प्रवेश नंगे पैर ही करना पड़ता है, यह नियम दुनिया के हर हिंदू मंदिर में है। इसके पीछे वैज्ञानिक कारण यह है कि मंदिर की फर्शों का निर्माण पुराने समय से अब तक इस प्रकार किया जाता है कि ये इलेक्ट्रिक और मैग्नैटिक तरंगों का सबसे बड़ा स्त्रोत होती हैं। जब इन पर नंगे पैर चला जाता है तो अधिकतम ऊर्जा पैरों के माध्यम से शरीर में प्रवेश कर जाती है।
 *🌺मंदिर में घंटा लगाने का कारण🌺*

मंदिर में घंटा लगाने का कारण
जब भी मंदिर में प्रवेश किया जाता है तो दरवाजे पर घंटा टंगा होता है जिसे बजाना होता है। मुख्य मंदिर (जहां भगवान की मूर्ति होती है) में भी प्रवेश करते समय घंटा या घंटी बजानी होती है, इसके पीछे कारण यह है कि इसे बजाने से निकलने वाली आवाज से सात सेकंड तक गूंज बनी रहती है जो शरीर के सात हीलिंग सेंटर्स को सक्रिय कर देती है।

#कर्मबंधन

 #कर्मबंधन
                                 
एक राजा बड़ा धर्मात्मा, न्यायकारी और परमेश्वर का भक्त था। उसने ठाकुरजी का मंदिर बनवाया और एक ब्राह्मण को उसका पुजारी नियुक्त किया।
वह ब्राह्मण बड़ा सदाचारी, धर्मात्मा और संतोषी था। वह राजा से कभी कोई याचना नहीं करता था, राजा भी उसके स्वभाव पर बहुत प्रसन्न था।
उसे राजा के मंदिर में पूजा करते हुए बीस वर्ष गुजर गये। उसने कभी भी राजा से किसी प्रकार का कोई प्रश्न नहीं किया।
राजा के यहाँ एक लड़का पैदा हुआ। राजा ने उसे पढ़ा लिखाकर विद्वान बनाया और बड़ा होने पर उसकी शादी एक सुंदर राजकन्या के साथ करा दी।
शादी करके जिस दिन राजकन्या को अपने राजमहल में लाये उस रात्रि में राजकुमारी को नींद न आयी।

वह इधर-उधर घूमने लगी जब अपने पति के पलंग के पास आयी तो क्या देखती है कि हीरे जवाहरात जड़ित मूठेवाली एक तलवार पड़ी है।
जब उस राजकन्या ने देखने के लिए वह तलवार म्यान में से बाहर निकाली, तब तीक्ष्ण धारवाली और बिजली के समान प्रकाशवाली तलवार देखकर वह डर गयी व डर के मारे उसके हाथ से तलवार गिर पड़ी और राजकुमार की गर्दन पर जा लगी।
राजकुमार का सिर कट गया और वह मर गया। राजकन्या पति के मरने का बहुत शोक करने लगी। उसने परमेश्वर से प्रार्थना की कि 'हे प्रभु ! मुझसे अचानक यह पाप कैसे हो गया ?
पति की मृत्यु मेरे ही हाथों हो गयी। आप तो जानते ही हैं, परंतु सभा में मैं सत्य न कहूँगी क्योंकि इससे मेरे माता-पिता और सास-ससुर को कलंक लगेगा तथा इस बात पर कोई विश्वास भी न करेगा।'
प्रातःकाल में जब पुजारी कुएँ पर स्नान करने आया तो राजकन्या ने उसको देखकर विलाप करना शुरु किया और इस प्रकार कहने लगीः
मेरे पति को कोई मार गया।" लोग इकट्ठे हो गये और राजा साहब आकर पूछने लगेः "किसने मारा है ?"
वह कहने लगीः "मैं जानती तो नहीं कि कौन था। परंतु उसे ठाकुरजी के मंदिर में जाते देखा था।
राजा समेत सब लोग ठाकुरजी के मंदिर में आये तो ब्राह्मण को पूजा करते हुए देखा। उन्होंने उसको पकड़ लिया और पूछाः "तूने राजकुमार को क्यों मारा ?"
ब्राह्मण ने कहाः "मैंने राजकुमार को नहीं मारा। मैंने तो उनका राजमहल भी नहीं देखा है। इसमें ईश्वर साक्षी हैं। बिना देखे किसी पर अपराध का दोष लगाना ठीक नहीं।"
ब्राह्मण की तो कोई बात ही नहीं सुनता था। कोई कुछ कहता था तो कोई कुछ;
राजा के दिल में बार-बार विचार आता था कि यह ब्राह्मण निर्दोष है परंतु बहुतों के कहने पर राजा ने ब्राह्मण से कहाः
"मैं तुम्हें प्राणदण्ड तो नहीं देता लेकिन जिस हाथ से तुमने मेरे पुत्र को तलवार से मारा है, तेरा वह हाथ काटने का आदेश देता हूँ।"
ऐसा कहकर राजा ने उसका हाथ कटवा दिया।

इस पर ब्राह्मण बड़ा दुःखी हुआ और राजा को अधर्मी जान उस देश को छोड़कर चला गया। वहाँ वह खोज करने लगा कि कोई विद्वान ज्योतिषी मिले तो बिना किसी अपराध हाथ कटने का कारण उससे पूछूँ।
किसी ने उसे बताया कि काशी में एक विद्वान ज्योतिषी रहते हैं।
तब वह उनके घर पर पहुँचा। ज्योतिषी कहीं बाहर गये थे, उसने उनकी धर्मपत्नी से पूछाः "माताजी ! आपके पति ज्योतिषी जी महाराज कहाँ गये हैं ?
तब उस स्त्री ने अपने मुख से अयोग्य, असह्य दुर्वचन कहे, जिनको सुनकर वह ब्राह्मण हैरान हुआ और मन ही मन कहने लगा कि "मैं तो अपना हाथ कटने का कारण पूछने आया था, परंतु अब इनका ही हाल पहले पूछूँगा।"
इतने में ज्योतिषी आ गये। घर में प्रवेश करते ही ब्राह्मणी ने अनेक दुर्वचन कहकर उनका तिरस्कार किया। परंतु ज्योतिषी जी चुप रहे और अपनी स्त्री को कुछ भी नहीं कहा।
तदनंतर वे अपनी गद्दी पर आ बैठे। ब्राह्मण को देखकर ज्योतिषी ने उनसे कहाः "कहिये, ब्राह्मण देवता ! कैसे आना हुआ ?"
आया तो था अपने बारे में पूछने के लिए परंतु पहले आप अपना हाल बताइये कि आपकी पत्नी अपनी जुबान से आपका इतना तिरस्कार क्यों करती है ?
जो किसी से भी नहीं सहा जाता और आप सहन कर लेते हैं, इसका कारण है ?"
यह मेरी स्त्री नहीं, मेरा कर्म है। दुनिया में जिसको भी देखते हो अर्थात् भाई, पुत्र, शिष्य, पिता, गुरु, सम्बंधी - जो कुछ भी है, सब अपना कर्म ही है।
यह स्त्री नहीं, मेरा किया हुआ कर्म ही है और यह भोगे बिना कटेगा नहीं।
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।
नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतेरपि॥

अपना किया हुआ जो भी कुछ शुभ-अशुभ कर्म है, वह अवश्य ही भोगना पड़ता है। बिना भोगे तो सैंकड़ों-करोड़ों कल्पों के गुजरने पर भी कर्म नहीं टल सकता।'
इसलिए मैं अपने कर्म खुशी से भोग रहा हूँ और अपनी स्त्री की ताड़ना भी नहीं करता, ताकि आगे इस कर्म का फल न भोगना पड़े।"
"महाराज ! आपने क्या कर्म किया था ?"
"सुनिये, पूर्वजन्म में मैं कौआ था और मेरी स्त्री गधी थी। इसकी पीठ पर फोड़ा था, फोड़े की पीड़ा से यह बड़ी दुःखी थी और कमजोर भी हो गयी थी।

मेरा स्वभाव बड़ा दुष्ट था, इसलिए मैं इसके फोड़े में चोंच मारकर इसे ज्यादा दुःखी करता था।
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जब दर्द के कारण यह कूदती थी तो इसकी फजीहत देखकर मैं खुश होता था। मेरे डर के कारण यह सहसा बाहर नहीं निकलती थी किंतु मैं इसको ढूँढता फिरता था।
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यह जहाँ मिले वहीं इसे दुःखी करता था। आखिर मेरे द्वारा बहुत सताये जाने पर त्रस्त होकर यह गाँव से दस-बारह मील दूर जंगल में चली गयी।
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वहाँ गंगा जी के किनारे सघन वन में हरा-हरा घास खाकर और मेरी चोटों से बचकर सुखपूर्वक रहने लगी।
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लेकिन मैं इसके बिना नहीं रह सकता था। इसको ढूँढते-ढूँढते मैं उसी वन में जा पहुँचा और वहाँ इसे देखते ही मैं इसकी पीठ पर जोर-से चोंच मारी तो मेरी चोंच इसकी हड्डी में चुभ गयी।
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इस पर इसने अनेक प्रयास किये, फिर भी चोंच न छूटी। मैंने भी चोंच निकालने का बड़ा प्रयत्न किया मगर न निकली।
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'पानी के भय से ही यह दुष्ट मुझे छोड़ेगा।' ऐसा सोचकर यह गंगाजी में प्रवेश कर गयी परंतु वहाँ भी मैं अपनी चोंच निकाल न पाया।
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आखिर में यह बड़े प्रवाह में प्रवेश कर गयी। गंगा का प्रवाह तेज होने के कारण हम दोनों बह गये और बीच में ही मर गये।
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तब गंगा जी के प्रभाव से यह तो ब्राह्मणी बनी और मैं बड़ा भारी ज्योतिषी बना। अब वही मेरी स्त्री हुई।
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जो मेरे मरणपर्यन्त अपने मुख से गाली निकालकर मुझे दुःख देगी और मैं भी अपने पूर्वकर्मों का फल समझकर सहन करता रहूँगा,
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इसका दोष नहीं मानूँगा क्योंकि यह किये हुए कर्मों का ही फल है। इसलिए मैं शांत रहता हूँ। अब अपना प्रश्न पूछो।"
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ब्राह्मण ने अपना सब समाचार सुनाया और पूछाः "अधर्मी पापी राजा ने मुझ निरपराध का हाथ क्यों कटवाया ?"
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ज्योतिषीः "राजा ने आपका हाथ नहीं कटवाया, आपके कर्म ने ही आपका हाथ कटवाया है।"
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"किस प्रकार ?"
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"पूर्वजन्म में आप एक तपस्वी थे और राजकन्या गौ थी तथा राजकुमार कसाई था।
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वह कसाई जब गौ को मारने लगा, तब गौ बेचारी जान बचाकर आपके सामने से जंगल में भाग गयी।
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पीछे से कसाई आया और आप से पूछा कि "इधर कोई गाय तो नहीं गया है ?"
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आपने प्रण कर रखा था कि 'झूठ नहीं बोलूँगा।' अतः जिस तरफ गौ गयी थी, उस तरफ आपने हाथ से इशारा किया तो उस कसाई ने जाकर गौ को मार डाला।
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गंगा के किनारे वह उसकी चमड़ी निकाल रहा था, इतने में ही उस जंगल से शेर आया और गौ एवं कसाई दोनों को खाकर गंगाजी के किनारे ही उनकी हड्डियाँ उसमें बह गयीं।
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गंगाजी के प्रताप से कसाई को राजकुमार और गौ को राजकन्या का जन्म मिला एवं पूर्वजन्म के किये हुए उस कर्म ने एक रात्रि के लिए उन दोनों को इकट्ठा किया।
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क्योंकि कसाई ने गौ को हंसिये से मारा था, इसी कारण राजकन्या के हाथों अनायास ही तलवार गिरने से राजकुमार का सिर कट गया और वह मर गया।
इस तरह अपना फल देकर कर्म निवृत्त हो गया। तुमने जो हाथ का इशारा रूप कर्म किया था, उस पापकर्म ने तुम्हारा हाथ कटवा दिया है।
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इसमें तुम्हारा ही दोष है किसी अन्य का नहीं, ऐसा निश्चय कर सुखपूर्वक रहो।"
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कितना सहज है ज्ञानसंयुक्त जीवन ! यदि हम इस कर्मसिद्धान्त को मान लें और जान लें तो पूर्वकृत घोर से घोर कर्म का फल भोगते हुए भी हम दुःखी नहीं होंगे बल्कि अपने चित्त की समता बनाये रखने में सफल होंगे।
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#भगवान_श्रीकृष्ण इस समत्व के अभ्यास को ही '#समत्व_योग' संबोधित करते हैं, जिसमें दृढ़ स्थिति प्राप्त होने पर मनुष्य कर्मबंधन से मुक्त हो जाता है।


👉एक बार एक संत ने अपने दो भक्तों को बुलाया और कहा आप को यहाँ से पचास कोस जाना है।



👉एक बार एक संत ने अपने दो
     भक्तों को बुलाया और कहा आप
     को यहाँ से पचास कोस जाना है।
👉एक भक्त को एक बोरी खाने के
     समान से भर कर दी और कहा जो
     लायक मिले उसे देते जाना
👉और एक को ख़ाली बोरी दी उससे
      कहा रास्ते मे जो उसे अच्छा मिले
      उसे बोरी मे भर कर ले जाए।
👉दोनो निकल पड़े जिसके कंधे पर
     समान था वो धीरे चल पा रहा था
👉ख़ाली बोरी वाला भक्त आराम से
      जा रहा था
👉थोड़ी दूर उसको एक सोने की ईंट
     मिली उसने उसे बोरी मे डाल
     लिया
👉थोड़ी दूर चला फिर ईंट मिली उसे
     भी उठा लिया
👉जैसे जैसे चलता गया उसे सोना
     मिलता गया और वो बोरी मे भरता
     हुआ चल रहा था
👉और बोरी का वज़न। बड़ता गया
      उसका चलना मुश्किल होता गया
     और साँस भी चढ़ने लग गई
👉एक एक क़दम मुश्किल होता
     गया ।
👉दूसरा भक्त जैसे जैसे चलता गया
     रास्ते मै जो भी मिलता उसको
     बोरी मे से खाने का कुछ समान
     देता गया धीरे धीरे बोरी का वज़न
     कम होता गया
👉और उसका चलना आसान होता
     गया।
👉जो बाँटता गया उसका मंज़िल
     तक पहुँचना आसान होता गया
👉जो ईकठा करता रहा वो रास्ते मे
     ही दम तोड़ गया
👉दिल से सोचना हमने जीवन मे
     क्या बाँटा और क्या इकट्ठा किया
     हम मंज़िल तक कैसे पहुँच पाएँगे।

👉जिन्दगी का कडवा सच...👈
👉आप को 60 साल की उम्र के बाद
     कोई यह नहीं पूछेंगा कि आप का
     बैंक बैलेन्स कितना है या आप के
     पास कितनी गाड़ियाँ हैं....?

👉दो ही प्रश्न पूछे जाएंगे ...👈
     1-आप का स्वास्थ्य कैसा है.....?
         और
     2-आप के बच्चे क्या करते हैं....?

👉 *किसी और का भेजा हुआ यह मैसेज*
    आपको भी अच्छा लगे तो
         ओरो को भी भेजें

👉क्या पता किसी की कुछ सोच
     बदल जाये।

👉प्यार बाटते रहो यही विनती है।