करूणा निधान आनन्द कन्द, श्री कृष्ण चन्द का ध्यान करो |
जय श्री राधे, जय श्री राधे, जय श्री राधे का गान करो ||
भूले-भटके जो नर-नारी, अब गीता को घित मँ लाओ |
गीता का झान सुनो भक्तों , गीता से ही मुक्ती पाओ ||
जो गीतम गीता गाता है, वह सब सुख सम्पति पाता है |
गीता को अपने हृदय धार, वह भक्त मुक्त हो जाता है ||
गीता है श्री मुख की वाणी, गीता को खण्डित मत करना |
गीता से विश्व हुवा पावन, बस गीता को निश दिन पढना ||
गीता वह कर्म सिखाती है, जिसमे सब सुख का सार छिपा|
गीता वह धर्म सिखाती है, जिसमे सारा व्यवहार छिपा||
जो भक्त हृदय से गीता को, सुनते है और सुनाते है |
सच्चिदानन्द परमेश्वर की, वह विमल भक्ति पा जाते है||
व्यवहार जगत में जीव आज, सब थके और अलसाये है|
सब ओर निराशा फैली है, आशा पर नज़र टिकाये हैं ||
जप तप व्रत भी सब करते है, जो जैसा हो सकता जिससे |
पर कष्ट अधिक बढ़ते जाते, दुखः गाये वह किससे-किससे ||
निज धर्म कर्म का झान नही, वह सही गलत ना जान सके |
अब मानव पथ से भ्रष्ट हुए, अपने को ना पहिचान सके ||
हे मनु पुत्रो तुम कर्मवीर, यो सबके पीछे मत भागो |
इस धर्म क्षेत्र कुरूक्षेत्र बीच, जागो हे मानव अब जागो ||
ले कल्प व्रक्ष गीता घर मे, सिहासन इसको बिठलाओ |
हो शुद्ध शांत जब समय मिले, तो इसके पास पहूँच जाओ ||
श्री हरि की वाणी को सुनकर, निज जीवन धन्य करो भक्तों |
गाओ श्री हरि की प्रिय गीता, भव सागर से तर लो भक्तों ||
जिस भाषा का हो झान तुम्हे, उस भाषा से गीता गाओ |
गीता का अर्थ तत्व जानो, गीता सुबोधिका घर लाओ ||
ईश्वर का अंश स्वयं तुम हो, अपने स्वरूप को पहचानो |
अस्तित्व तुम्हारा भी कुछ है, गीता की महिमा से जानो ||
निज झान जगा कर स्वयम आप, अपना उद्धार करो मानव |
दानव वल का संहार करो, धरती का भार हरो मानव ||
है काम, क्रोध,लालच तीनो, बस इनका ही संहार करो |
जन-जन में गीता पहुचाओ, अब इसका बहुत प्रचार करो ||
हम सबको आज बदलना है, हम सबको आज यही गाना |
अनुवाद सरल सुन्दर सुबोध, प्रिय गीता ललित को घर लाना||
यदि भाग्य हमार है जागा, भगवान साथ थब होगा ही |
कल्याण सभी का
जय श्री राधे, जय श्री राधे, जय श्री राधे का गान करो ||
भूले-भटके जो नर-नारी, अब गीता को घित मँ लाओ |
गीता का झान सुनो भक्तों , गीता से ही मुक्ती पाओ ||
जो गीतम गीता गाता है, वह सब सुख सम्पति पाता है |
गीता को अपने हृदय धार, वह भक्त मुक्त हो जाता है ||
गीता है श्री मुख की वाणी, गीता को खण्डित मत करना |
गीता से विश्व हुवा पावन, बस गीता को निश दिन पढना ||
गीता वह कर्म सिखाती है, जिसमे सब सुख का सार छिपा|
गीता वह धर्म सिखाती है, जिसमे सारा व्यवहार छिपा||
जो भक्त हृदय से गीता को, सुनते है और सुनाते है |
सच्चिदानन्द परमेश्वर की, वह विमल भक्ति पा जाते है||
व्यवहार जगत में जीव आज, सब थके और अलसाये है|
सब ओर निराशा फैली है, आशा पर नज़र टिकाये हैं ||
जप तप व्रत भी सब करते है, जो जैसा हो सकता जिससे |
पर कष्ट अधिक बढ़ते जाते, दुखः गाये वह किससे-किससे ||
निज धर्म कर्म का झान नही, वह सही गलत ना जान सके |
अब मानव पथ से भ्रष्ट हुए, अपने को ना पहिचान सके ||
हे मनु पुत्रो तुम कर्मवीर, यो सबके पीछे मत भागो |
इस धर्म क्षेत्र कुरूक्षेत्र बीच, जागो हे मानव अब जागो ||
ले कल्प व्रक्ष गीता घर मे, सिहासन इसको बिठलाओ |
हो शुद्ध शांत जब समय मिले, तो इसके पास पहूँच जाओ ||
श्री हरि की वाणी को सुनकर, निज जीवन धन्य करो भक्तों |
गाओ श्री हरि की प्रिय गीता, भव सागर से तर लो भक्तों ||
जिस भाषा का हो झान तुम्हे, उस भाषा से गीता गाओ |
गीता का अर्थ तत्व जानो, गीता सुबोधिका घर लाओ ||
ईश्वर का अंश स्वयं तुम हो, अपने स्वरूप को पहचानो |
अस्तित्व तुम्हारा भी कुछ है, गीता की महिमा से जानो ||
निज झान जगा कर स्वयम आप, अपना उद्धार करो मानव |
दानव वल का संहार करो, धरती का भार हरो मानव ||
है काम, क्रोध,लालच तीनो, बस इनका ही संहार करो |
जन-जन में गीता पहुचाओ, अब इसका बहुत प्रचार करो ||
हम सबको आज बदलना है, हम सबको आज यही गाना |
अनुवाद सरल सुन्दर सुबोध, प्रिय गीता ललित को घर लाना||
यदि भाग्य हमार है जागा, भगवान साथ थब होगा ही |
कल्याण सभी का
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