Tuesday, July 24, 2018

गोस्वामी तुलसी दास जी

गोस्वामी तुलसी दास जी

क्रम:  6

श्री मीराबाई का पत्र :

उन्हीं दिनों मेवाड़ से मीराबाई का पत्र लेकर सुखपाल नामक एक ब्राह्मण आया था ।मीराबाई का प्राकट्य उस दौर में हुआ था जब राजपूतों की स्त्रियां उघडा सिर नृत्य करना तो दूर , सूरज की किरणे भी उन्हें नहीं स्पर्श कर पाती थी । राजपूतों की स्त्रियो को बहुत मर्यादा और भारी नियम कानून के साथ रहना पड़ता था परंतु भक्ति की उन्मत्त अवस्था में मान मर्यादा का होश रहता ही कहा है ? कृष्ण भक्तो के संग मीरा कृष्ण मंदिर में नृत्य करती रहती ।

उसके परिवार को यह सब पसंद नहीं था ।मीरा महल से बाहर न जाए इसलिए राजा ने महल के भीतर ही कृष्णमंदिर बनवा दिया था परंतु वहाँ भी साधु संत मीरा का नृत्य देखने पहुँच जाते । मीरा के देवर जी को यह सब बिलकुल पसंद नहीं आता था ।कृष्णभक्ति में नाचना और गाना राज परिवार को भी अच्छा नहीं लगा। उन्होंने कई बार मीराबाई को विष देकर मारने की कोशिश की। घर वालों के इस प्रकार के व्यवहार से परेशान होकर मीरा जी द्वारका और वृंदावन गईं। वह जहाँ जाती थीं, वहाँ लोगों का सम्मान मिलता था। लोग आपको देवियों के जैसा प्यार और सम्मान देते थे। इसी दौरान उन्होंने तुलसीदास को पत्र लिखा था :-

स्वस्ति श्रीतुलसी गुण भूषण ,दूषण हरण गुसाई ।
बारहि बार प्रणाम करहुँ , हरे शोक समुदाई ।।
घरके स्वजन हमारे जेते , सबहि उपाधि बढ़ाई ।
साधु संग अरु भजन करत मोंहि देत कलेस महाई ।।
बालपने ते मीरा कीन्ही गिरिधर लाल मिताई ।
सो तो अब छूटै नहिं क्यों हूँ लगी लगन बरियाई ।।
मेरे मात पिता सम हौ हरि भक्तन समुदाई ।
हम कूँ कहा उचित करिबो है सो लिखिए समुझाई ।।

मीराबाई के पत्र का जबाव तुलसी दास ने इस प्रकार दिया:-

जाके प्रिय न राम बैदेही ।
तजिये ताहि कोटि बैरी सम, जदपि प्रेम सनेही ।।
तज्यो पिता प्रहलाद, विभीषण बंधु , भरत महतारी ।
बलि गुरु तज्यो कंत ब्रज-बनित्नहिं , भए मुद-मंगलकारी।।
नाते नेह रामके मनियत सुह्र्द सुसेब्य जहां लौं ।
अंजन कहा आंखि जेहि फूटै ,बहुतक कहौं कहाँ लौं ।।
तुलसी सो सब भांति परम हित पूज्य प्रानते प्यारे ।
जासों होय सनेह राम –पद , एतो मतो हमारो ।

श्री रामचरितमानस की रचना :

तत्पश्चात् गोस्वामी जी काशी पहुंचे और वहां प्रह्लाद घाटपर एक ब्रह्मण के घर निवास किया । वहां उनकी कवित्व शक्ति स्फुरित हो गयी और वह संस्कृत में रचना करने लगे । यह एक अद्भुत बात थी कि दिन मे वे जितनी कविता रचना करते रात मे सब की सब लुप्त हो जाती । यह घटना रोज घटती परंतु वे समझ नही पाते थे कि मुझको क्या करना चाहिये । आठवें दिन तुलसीदास जी को स्वप्न हुआ । भगवान् शंकर ने प्रकट होकर कहा कि तुम अपनी भाषा मे काव्य रचना करो , संस्कृत में नहीं ।

नींद उचट गयी तुलसीदास जी उठकर बैठ गये ।उनके हृदय मे स्वप्न की आवाज गूंजने लगी । उसी समय भगवान् श्री शंकर और माता पार्वती दोनों ही उनके सामने प्रकट हुए । तुल्सीदास जी ने साष्टांग् प्रणाम किया । शिव जी ने कहा कि – मातृभाषा में काव्य निर्माण करो , संस्कृत के पचडे में मत पडो । जिससे सबका कल्याण हो वही करना चाहिये । बिना सोचे विचारे अनुकरण करने की आवश्यकता नहीं है । तुम जाकर अयोध्या में रहो और वही काव्य रचना करो । जहां भगवान् की जन्म स्थली है और जो भगवान् श्रीसीताराम जी का नित्य धाम है वही उनकी कथा की रचना करना उचित होगा । मेरे आशीर्वाद से तुम्हारी कविता सामवेद के समान सफल होगी

क्रमशः अगले क्रम: में...

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