*भगवद् गीता – पूर्ण प्रश्न पूर्ण उत्तर*
*प्रश्न 1. मैं कौन हूँ ?*
उत्तर –
*ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः |*
*मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति || 15.7*
इस बद्ध जगत में सारे जीव मेरे(श्री कृष्ण के) शाश्वत अंश हैं | बद्ध जीवन के कारण वे छहों इन्द्रियों से घोर संघर्ष कर रहे हैं, जिनमें मन भी सम्मिलित है |
*प्रश्न 2. कोई जीव निम्न तथा उच्च योनिओं में जन्म क्यों लेता है ?*
उत्तर –
*पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान् |*
*कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु || 13.22*
इस प्रकार जीव प्रकृति के तीनों गुणों का भोग करता हुआ प्रकृति में ही जीवन बिताता है | यह उस प्रकृति के साथ संगति के कारण है | इस तरह उसे उत्तम तथा अधम योनियाँ मिलती रहती हैं |
*प्रश्न 3. शान्ति कैसे प्राप्त की जा सकती है ?*
उत्तर –
*भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् |*
*सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति || 5.29*
मुझे (श्री कृष्ण को ) समस्त यज्ञों तथा तपस्याओं का परम भोक्ता, समस्त लोकों तथा देवताओं का परमेश्वर एवं समस्त जीवों का उपकारी एवं हितैषी जानकर मेरे (श्री कृष्ण के) भावनामृत से पूर्ण पुरुष भौतिक दुखों से शान्ति लाभ करता है |
*प्रश्न 4. भगवान् कौन हैं ?*
उत्तर –
अर्जुन उवाच |
*परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् |*
*पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् ||*
*आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा |*
*असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे ||10.12-13 ||*
अर्जुन ने कहा – आप (श्री कृष्ण) परम भगवान्, परम धाम, परम पवित्र, परम सत्य हैं | आप शाश्वत, दिव्य, आदि पुरुष,अज (अजन्मा) तथा महानतम हैं | नारद, असित, देवल तथा व्यास जैसे ऋषि आपके इस सत्य की पुष्टि करते हैं और आप स्वयं भी मुझसे प्रकट कह रहे हैं |
*प्रश्न 5. मुक्ति का सबसे सरल मार्ग क्या है ?*
उत्तर –
*जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः |*
*त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोSर्जुन || 4.9*
हे अर्जुन! जो मेरे(श्री कृष्ण के) अविर्भाव तथा कर्मों की दिव्य प्रकृति को जानता है, वह इस शरीर को छोड़ने पर इस भौतिक संसार में पुनः जन्म नहीं लेता, अपितु मेरे(श्री कृष्ण के) सनातन धाम को प्राप्त होता है |
*प्रश्न 6. भगवान् (श्री कृष्ण को) को तत्त्व से कैसे जान सकते हैं ?*
उत्तर –
*भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः |*
*ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ||18.55*
केवल भक्ति से मुझे (श्री कृष्ण को) यथारूप(तत्त्व से) जाना जा सकता है | जब व्यक्ति ऐसी भक्ति से मेरे(श्री कृष्ण के) पूर्ण भावनामृत में होता है, तो वह वैकुण्ठ (भगवद्धाम) में प्रवेश कर सकता है |
*प्रश्न 7. भगवान् (श्री कृष्ण को) को प्राप्त करने का सरल तथा सर्वोत्तम तरीका क्या है ?*
उत्तर –
*मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु |*
*मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे || 18.65 ||*
सदैव मेरा(श्री कृष्ण का) चिन्तन करो, मेरे(श्री कृष्ण के) भक्त बनो, मेरी पूजा (श्री कृष्ण की) पूजा करो और मुझे (श्री कृष्ण को) नमस्कार करो | इस प्रकार तुम निश्चित रूप से मेरे(श्री कृष्ण के) पास आओगे | मैं तुम्हें वचन देता हूँ , क्योंकि तुम(अर्जुन) मेरे अतिप्रिय मित्र हो |
*प्रश्न 8. भगवद्ज्ञान को किस प्रकार प्राप्त कर सकते है ?*
उत्तर –
*तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया |*
*उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः || 4.34 ||*
तुम गुरु के पास जाकर सत्य को जानने का प्रयास करो | उनसे विनीत होकर जिज्ञासा करो और उनकी सेवा करो | स्वरुपसिद्ध व्यक्ति तुम्हें ज्ञान प्रदान कर सकते हैं, क्योंकि उन्होंने सत्य का दर्शन किया है |
*प्रश्न 1. मैं कौन हूँ ?*
उत्तर –
*ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः |*
*मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति || 15.7*
इस बद्ध जगत में सारे जीव मेरे(श्री कृष्ण के) शाश्वत अंश हैं | बद्ध जीवन के कारण वे छहों इन्द्रियों से घोर संघर्ष कर रहे हैं, जिनमें मन भी सम्मिलित है |
*प्रश्न 2. कोई जीव निम्न तथा उच्च योनिओं में जन्म क्यों लेता है ?*
उत्तर –
*पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान् |*
*कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु || 13.22*
इस प्रकार जीव प्रकृति के तीनों गुणों का भोग करता हुआ प्रकृति में ही जीवन बिताता है | यह उस प्रकृति के साथ संगति के कारण है | इस तरह उसे उत्तम तथा अधम योनियाँ मिलती रहती हैं |
*प्रश्न 3. शान्ति कैसे प्राप्त की जा सकती है ?*
उत्तर –
*भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् |*
*सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति || 5.29*
मुझे (श्री कृष्ण को ) समस्त यज्ञों तथा तपस्याओं का परम भोक्ता, समस्त लोकों तथा देवताओं का परमेश्वर एवं समस्त जीवों का उपकारी एवं हितैषी जानकर मेरे (श्री कृष्ण के) भावनामृत से पूर्ण पुरुष भौतिक दुखों से शान्ति लाभ करता है |
*प्रश्न 4. भगवान् कौन हैं ?*
उत्तर –
अर्जुन उवाच |
*परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् |*
*पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् ||*
*आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा |*
*असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे ||10.12-13 ||*
अर्जुन ने कहा – आप (श्री कृष्ण) परम भगवान्, परम धाम, परम पवित्र, परम सत्य हैं | आप शाश्वत, दिव्य, आदि पुरुष,अज (अजन्मा) तथा महानतम हैं | नारद, असित, देवल तथा व्यास जैसे ऋषि आपके इस सत्य की पुष्टि करते हैं और आप स्वयं भी मुझसे प्रकट कह रहे हैं |
*प्रश्न 5. मुक्ति का सबसे सरल मार्ग क्या है ?*
उत्तर –
*जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः |*
*त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोSर्जुन || 4.9*
हे अर्जुन! जो मेरे(श्री कृष्ण के) अविर्भाव तथा कर्मों की दिव्य प्रकृति को जानता है, वह इस शरीर को छोड़ने पर इस भौतिक संसार में पुनः जन्म नहीं लेता, अपितु मेरे(श्री कृष्ण के) सनातन धाम को प्राप्त होता है |
*प्रश्न 6. भगवान् (श्री कृष्ण को) को तत्त्व से कैसे जान सकते हैं ?*
उत्तर –
*भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः |*
*ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ||18.55*
केवल भक्ति से मुझे (श्री कृष्ण को) यथारूप(तत्त्व से) जाना जा सकता है | जब व्यक्ति ऐसी भक्ति से मेरे(श्री कृष्ण के) पूर्ण भावनामृत में होता है, तो वह वैकुण्ठ (भगवद्धाम) में प्रवेश कर सकता है |
*प्रश्न 7. भगवान् (श्री कृष्ण को) को प्राप्त करने का सरल तथा सर्वोत्तम तरीका क्या है ?*
उत्तर –
*मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु |*
*मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे || 18.65 ||*
सदैव मेरा(श्री कृष्ण का) चिन्तन करो, मेरे(श्री कृष्ण के) भक्त बनो, मेरी पूजा (श्री कृष्ण की) पूजा करो और मुझे (श्री कृष्ण को) नमस्कार करो | इस प्रकार तुम निश्चित रूप से मेरे(श्री कृष्ण के) पास आओगे | मैं तुम्हें वचन देता हूँ , क्योंकि तुम(अर्जुन) मेरे अतिप्रिय मित्र हो |
*प्रश्न 8. भगवद्ज्ञान को किस प्रकार प्राप्त कर सकते है ?*
उत्तर –
*तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया |*
*उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः || 4.34 ||*
तुम गुरु के पास जाकर सत्य को जानने का प्रयास करो | उनसे विनीत होकर जिज्ञासा करो और उनकी सेवा करो | स्वरुपसिद्ध व्यक्ति तुम्हें ज्ञान प्रदान कर सकते हैं, क्योंकि उन्होंने सत्य का दर्शन किया है |
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