Wednesday, July 25, 2018

आत्मचिंतन

 मित्रो ! मन, लोभ, मोह के विचारों, वासना-तृष्णा के धमाचौकड़ी से खाली रहे तो मनुष्य प्रतिभावान, तेजस्वी एवं अग्रगामी महामानवों में गिना जा सकने योग्य तानाबाना बुन सकता है। ऐसे व्यक्ति साधारण परिस्थितियों में भी, साधनों और सहयोगियों का अभाव होते हुए भी अपने व्यक्तिगत चुम्बकत्त्व द्वारा जो आवश्यक है उसे निखिल ब्रह्माण्ड में से अपने लिए खींच बुलाते हैं। ऐसे तेजस्वी व्यक्ति अपने बलबूते आगे बढ़ते हैं और बाँस की तरह झुरमुट बनाते हुए असाधारण ऊँचाई तक जा पहुँचते हैं। यह उनकी आन्तरिक जीवट का प्रतिफल है। इसी को कुण्डलिनी कहते हैं। इसके जाग्रत होने पर मनुष्य निर्भय और निश्चयी बन जाता और कठिनाई, समस्याओं और आक्रमणों के विरुद्ध इस प्रकार लोहा लेता है मानो उसे खेल के मैदान में कला-कौशल भर दिखाना है।

 उत्तम साधक वही है जो दरिद्रता के साथ रहने को कहा जाय तो दरिद्रता के साथ रहे, किसी भी अभाव की वेदना उसे न हो और उसकी दैवी स्थिति के पूर्ण आन्तरिक आनन्द की क्रीड़ा में उससे कुछ भी बाधा न पड़े और वही फिर, वैभव के साथ रहने को कहा जाय तो वैभव के साथ रहे और अपने धन की आसक्ति या वासना में एक क्षण के लिये भी पतित न हो, या उन चीजों से भी आसक्त न हो जिनका वह उपयोग करता है, या उस भोग की दासता में न हो या धन की अधिकारिता द्वारा निर्मित अभ्यासों से दुर्बल की तरह आसक्त न हो।
radhey radhey
🔶एक लगनशील व्यक्ति अपने अनेक साथी-सहचर पैदा कर सकता है। जुआरी, शराबी, व्यभिचारी जब अपने कई साथी पैदा कर सकते हैं तो प्रबुद्ध व्यक्ति वैसा क्यों नहीं कर सकते? डाकुओं के छोटे-छोटे गिरोह जब एक बड़े क्षेत्र को आतंकित कर सकते हैं तो सही लोगों का संगठन क्या कुछ नहीं कर सकते? लगन की आग बड़ी प्रबल है। यह जिधर भी लगती है दावानल का रूप धारण करती है। युग निर्माता महापुरुष अकेले ही चले हैं, लोगों ने उनका विरोध-प्रतिरोध भी खूब किया फिर भी वे अपनी लगन के आधार पर अद्भुत सफलता प्राप्त कर सके-यही मार्ग हर लगनशील के लिए खुला पड़ा है। 

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