Wednesday, July 25, 2018

भगवान का नाम, और नाम स्मरण, संकीर्तन से मन निर्मल होता है...

भगवान का नाम, और नाम स्मरण,  संकीर्तन से मन निर्मल होता है...
भगवान स्वयं हृदय में प्रकट होते हैं l संयम, सदाचार, स्नेह, और सेवा भाव , भगवान की और क़दम बढ़ाने में मदद करते हैं l भक्त को अपनी सारी वृत्तियों को समेट कर ..  साधन पथ पर सतत चलना चाहिए , तभी उसका मन भगवान में व भक्ति में सहज भाव से केन्द्रित हो पाएगा। जितने भी नामी सन्त - महात्मा संसार में हुए हैं , उन्होंने भी बस अपने मन को ही थामा था , और परिणाम स्वरूप मन भावन भगवान मनमोहन कृष्ण को पा लिया l

तन और मन का साथ चोली और दामन जैसा है। ये दोनों ही एक-दूसरे के पूरक और पोषक हैं।  यदि मन में मलिनता हो तो भला तन की सुंदरता किस काम की ? क्योंकि वह शरीर तो विष भरे स्वर्ण कलश के समान होगा। सोने के घड़े की ऊपरी चमक-दमक तभी अच्छी लगती है , जबकि उसमें अमृततुल्य मधुर रस भरा हो। शरीर का सौंदर्य तभी मायने रखता है , जबकि अंदर से हमारा मन भी साफ-शुद्ध अर्थात निर्मल हो। सुख , शांति , संतोष और आनंद के लिए यह आवश्यक है। समय बदला , समाज बदला , संबंध बदले , किंतु तन-मन की सुंदरता के बारे में सोच और विचार नहीं बदले। आज भी तन के साथ मन की सुंदरता ही सच्ची सुंदरता मानी जाती है। मन का शोधन , स्वच्छता व संयम अध्यात्म की पहली सीढ़ी है और उत्थान का मार्ग है। इसके लिए सदा प्रयत्नशील बने रहना चाहिए। कार्य असंभव नहीं है , किंतु इसके लिए ज्ञान की आवश्यकता पड़ती है। अपने स्वभाव को बदलना पड़ता है। कुभाव को छोड़कर सुभाव अपनाना पड़ता है। अपने आचरण को सुंदर , सदाचारी बनाना पड़ता है , ताकि सतोगुण बढ़े और रजोगुण व तमोगुण दूर हो सकें। यदि मन शांत और स्थिर है , तो तनाव , कुंठा , क्रोध और अवसाद जैसे विकार नहीं सताते। अनावश्यक कष्ट और क्लेश जीवन में नहीं आते। वस्तुत: निर्मल मन के व्यक्ति ही सच्चिदानंद स्वरूप भगवान को पा सकते हैं।

जिसके मन में छल , कपट , वैर , द्वेष , घृणा और हिंसा के कुभाव भरे रहते हैं , उसके सुकृत नष्ट हो जाते हैं। धन , साधन और सुविधाओं के बावजूद वह व्यक्ति सुखी नहीं रह पाता और तरह-तरह के दुखों से घिरा रहता है। तन स्थूल है , अत: दिखाई देता है। किंतु मन परदे के पीछे और सूक्ष्म रूप में छिपा रहता है। अत्यंत चंचल गतिमान और शक्तिशाली होने के बावजूद वह दिखाई नहीं देता। वायु , तरंग तथा गुरुत्वाकर्षण शक्ति की भांति वह होते हुए भी अदृश्य रहता है। इसलिए जरा सी असावधानी , से उस पर अज्ञान , आलस्य , प्रमाद अकर्मण्यता और उदासीनता जैसे मैल की परत चढ़ जाती है। हम तन को तो धोते और चमकाते रहते हैं , किंतु मन मैला और रोगी होता चला जाता है। मन के धरातल पर छाई मलिनता के लक्षण अहंकार , स्वार्थ चोरी , बेईमानी , धूर्तता तथा दुराचार आदि के रूप में प्रगट होते हैं। परिणाम विनाशकारी होता है। शरीर भी रोगी और जर्जर हो जाता है तथा असमय ही काल के गाल में चला जाता है। इसीलिए सभी संतों और महापुरुषों ने मन की स्वच्छता पर जोर दिया है

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