श्री शिव पुराण (पोस्ट 10)
विद्येश्वरसंहिता
अध्याय तीन~ साध्य साधन आदि के विचार तथा श्रवण, कीर्तन और मनन-- इन तीनों साधनों की श्रेष्ठता का प्रतिपादन।
व्यास जी कहते हैं - सूतजी का यह वचन सुनकर वे सब महर्षि बोले~अब आप हमें वेदांतसार - सर्वस्वरुप अद्भुत शिव पुराण की कथा सूनाईये ।
सूतजी ने कहा~ आप सभी रोग-शोक से रहित कल्याणमय भगवान शिव का स्मरण करके पुराणप्रवर शिवपुराण की, जो वेद के सार- तत्व से प्रकट हुआ है, कथा सूनिये !शिवपुराण में भक्ति, ज्ञान और वैराग्य इन तीनों का प्रीतिपूर्वक गान किया गया है और वेदांतवेद्य सद्ववस्तु का विशेष रुप से वर्णन हैं । इस वर्तमान कल्प मे जब सृष्टि कर्म का आरंभ हुआ था, उन दिनों छः कुलो के महर्षि परस्पर वाद विवाद करते हुए कहने लगे - अमुक वस्तु सबसे उतकृष्ट हैं और अमुक वस्तु नहीं है । उनके इस विवाद ने अत्यन्त महान रुप धारण कर लिया । तब वे सब-के-सब अपनी शंका के समाधान के लिये सृष्टि कर्ता अविनाशी ब्रम्हाजी के पास गये और हाथ जोडकर विनयभरी वाणी मे बोले - प्रभो ! आप संपुर्ण जगत के पालन पोषण करनेवाले तथा समस्त कारणो के भी कारण है । हम यह जानना चाहते हैं की संपुर्ण तत्वो से परे परात्पर पूराण पुरुष कौन हैं ?
ब्रम्हाजी ने कहा - जहाँ से मन सहित वाणी उन्हें न पाकर लौट आती है तथा ब्रह्मा , विष्णु , रूद्र और इन्द्र आदि से युक्त यूक्त यह संपुर्ण जगत समस्त भूतो एवं इन्द्रियों के साथ पहले प्रकट हुआ है , वे ही ये देव ,महादेव सर्वज्ञ एवं संपुर्ण जगत के स्वामी है । ये हि सबसे उत्कृष्ट है ।भक्ति से हि इनका साझात्कार होता है ।दूसरे किसी उपाय से इनका दर्शन नहीं होता । रूद्र ,हरि , हर तथा अन्य देवेश्वर सदा उतम भक्ति भाव से उनका दर्शन करना चाहते है । भगवान् शिव मे भक्ति होने से मनुष्य संसार बंधन से मुक्त हो जाता है। देवता के कृपा प्रसाद से उनमे भक्ति होती है और भक्ति से देवता का कृपाप्रसाद प्राप्त होती है - ठिक उसी तरह , जैसे अंकुर से बीज और बीज से अंकुर पैदा होता है । इसिलिये तुम सब ब्रम्हर्षि भगवान शंकर का कृपाप्रसाद प्राप्त करने के लिये भुतल पर जाकर वहॉ सहस्त्रो बर्षो तक चालु रहने वाले एक विशाल यज्ञ का आयोजन करो । इन यज्ञपति भगवान शिव कि हि कृपा से वेदोक्त विद्या के सारभुत साध्य साधन का ज्ञान होता है ।
शिवपद कि प्राप्ति हि साध्य है ।उनकी सेवा हि साधन है तथा उनके प्रसाद से जो नित्य -नैमितिक आदि फलो कि ओर से निःस्पृह होता है , वही साधक है । वेदोक्त कर्म का अनुष्ठान करके उसके महान फल को भगवान शिव के चरणों में समर्पित कर देना हि परमेश्वर पद कि प्राप्ति है। वही सालोक्य आदि के क्रम से प्राप्त होने वाली मुक्ति है । उन-उन पुरुषों कि भक्ति के अनुसार उन सबको उत्कृष्ट फल कि प्राप्ति होती है । उस भक्ति के साधन अनेक प्रकार के है ,जिनका प्रतिपादन साक्षात महेश्वर ने हि किया है । उन मे से सार भुत साधन को संक्षित करके मै बता रहा हु । कान से भगवान के नाम गुण और लीलाओं का श्रवण वाणी द्वारा उनका किर्तन तथा मन द्वारा उनका मनन - इन तीनो को महान साधन कहा गया है । तात्पर्य यह कि महेश्वर का श्रवण, किर्तन और मनन करना चाहिये - यह श्रुति का वाक्य हम सब के लिये प्रमाणभुत है । इसी साधन से संपुर्ण मनोरथो कि सिद्धि में लगे हुए आपलोग परम साध्य हो । लोग प्रत्यक्ष वस्तु को आँख से देख कर उसमे प्रवृत होते है । परन्तु जिस वस्तु का कही भी प्रत्यक्ष दर्शन नहीं होता उसे श्रवणेन्द्रिया द्वारा जान सुनकर मनुष्य उसकी प्राप्ति के लिये चेष्टा करता है । अतः पहला साधन श्रवण हि है । उसके द्वारा गुरु के मुख से तत्व को सुनकर श्रेष्ठ बुद्धि वाला विद्वान पुरुष अन्य साधन किर्तन एवं मनन कि सिद्धि करे । क्रमशः मननपर्यन्त इस साधन कि अच्छी तरह साधन कर लेने पर उसके द्वारा सालोक्य आदि के क्रम से धीरे-धीरे भगवान शिव का संयोग प्राप्त होता है । पहले सारे अंगो के रोग नष्ट हो जाते है । फिर सब प्रकार का लौकिक आनन्द विलीन हो जाता है ।
भगवान शंकर कि पुजा ,उनके नामो के जप तथा उनके गुण , रुप ,विलास और नामो का युक्ति परायण चित के द्वारा जो निरंतर परिशोधन या चिंतन होता है , उसी को मनन कहा गया है ; वह महेश्वर कि कृपा-दृष्टि से उपलब्ध होता है । उसे सब साधनो मे श्रेष्ठ या प्रधान कहा गया है ।
*हर हर महादेव*
विद्येश्वरसंहिता
अध्याय तीन~ साध्य साधन आदि के विचार तथा श्रवण, कीर्तन और मनन-- इन तीनों साधनों की श्रेष्ठता का प्रतिपादन।
व्यास जी कहते हैं - सूतजी का यह वचन सुनकर वे सब महर्षि बोले~अब आप हमें वेदांतसार - सर्वस्वरुप अद्भुत शिव पुराण की कथा सूनाईये ।
सूतजी ने कहा~ आप सभी रोग-शोक से रहित कल्याणमय भगवान शिव का स्मरण करके पुराणप्रवर शिवपुराण की, जो वेद के सार- तत्व से प्रकट हुआ है, कथा सूनिये !शिवपुराण में भक्ति, ज्ञान और वैराग्य इन तीनों का प्रीतिपूर्वक गान किया गया है और वेदांतवेद्य सद्ववस्तु का विशेष रुप से वर्णन हैं । इस वर्तमान कल्प मे जब सृष्टि कर्म का आरंभ हुआ था, उन दिनों छः कुलो के महर्षि परस्पर वाद विवाद करते हुए कहने लगे - अमुक वस्तु सबसे उतकृष्ट हैं और अमुक वस्तु नहीं है । उनके इस विवाद ने अत्यन्त महान रुप धारण कर लिया । तब वे सब-के-सब अपनी शंका के समाधान के लिये सृष्टि कर्ता अविनाशी ब्रम्हाजी के पास गये और हाथ जोडकर विनयभरी वाणी मे बोले - प्रभो ! आप संपुर्ण जगत के पालन पोषण करनेवाले तथा समस्त कारणो के भी कारण है । हम यह जानना चाहते हैं की संपुर्ण तत्वो से परे परात्पर पूराण पुरुष कौन हैं ?
ब्रम्हाजी ने कहा - जहाँ से मन सहित वाणी उन्हें न पाकर लौट आती है तथा ब्रह्मा , विष्णु , रूद्र और इन्द्र आदि से युक्त यूक्त यह संपुर्ण जगत समस्त भूतो एवं इन्द्रियों के साथ पहले प्रकट हुआ है , वे ही ये देव ,महादेव सर्वज्ञ एवं संपुर्ण जगत के स्वामी है । ये हि सबसे उत्कृष्ट है ।भक्ति से हि इनका साझात्कार होता है ।दूसरे किसी उपाय से इनका दर्शन नहीं होता । रूद्र ,हरि , हर तथा अन्य देवेश्वर सदा उतम भक्ति भाव से उनका दर्शन करना चाहते है । भगवान् शिव मे भक्ति होने से मनुष्य संसार बंधन से मुक्त हो जाता है। देवता के कृपा प्रसाद से उनमे भक्ति होती है और भक्ति से देवता का कृपाप्रसाद प्राप्त होती है - ठिक उसी तरह , जैसे अंकुर से बीज और बीज से अंकुर पैदा होता है । इसिलिये तुम सब ब्रम्हर्षि भगवान शंकर का कृपाप्रसाद प्राप्त करने के लिये भुतल पर जाकर वहॉ सहस्त्रो बर्षो तक चालु रहने वाले एक विशाल यज्ञ का आयोजन करो । इन यज्ञपति भगवान शिव कि हि कृपा से वेदोक्त विद्या के सारभुत साध्य साधन का ज्ञान होता है ।
शिवपद कि प्राप्ति हि साध्य है ।उनकी सेवा हि साधन है तथा उनके प्रसाद से जो नित्य -नैमितिक आदि फलो कि ओर से निःस्पृह होता है , वही साधक है । वेदोक्त कर्म का अनुष्ठान करके उसके महान फल को भगवान शिव के चरणों में समर्पित कर देना हि परमेश्वर पद कि प्राप्ति है। वही सालोक्य आदि के क्रम से प्राप्त होने वाली मुक्ति है । उन-उन पुरुषों कि भक्ति के अनुसार उन सबको उत्कृष्ट फल कि प्राप्ति होती है । उस भक्ति के साधन अनेक प्रकार के है ,जिनका प्रतिपादन साक्षात महेश्वर ने हि किया है । उन मे से सार भुत साधन को संक्षित करके मै बता रहा हु । कान से भगवान के नाम गुण और लीलाओं का श्रवण वाणी द्वारा उनका किर्तन तथा मन द्वारा उनका मनन - इन तीनो को महान साधन कहा गया है । तात्पर्य यह कि महेश्वर का श्रवण, किर्तन और मनन करना चाहिये - यह श्रुति का वाक्य हम सब के लिये प्रमाणभुत है । इसी साधन से संपुर्ण मनोरथो कि सिद्धि में लगे हुए आपलोग परम साध्य हो । लोग प्रत्यक्ष वस्तु को आँख से देख कर उसमे प्रवृत होते है । परन्तु जिस वस्तु का कही भी प्रत्यक्ष दर्शन नहीं होता उसे श्रवणेन्द्रिया द्वारा जान सुनकर मनुष्य उसकी प्राप्ति के लिये चेष्टा करता है । अतः पहला साधन श्रवण हि है । उसके द्वारा गुरु के मुख से तत्व को सुनकर श्रेष्ठ बुद्धि वाला विद्वान पुरुष अन्य साधन किर्तन एवं मनन कि सिद्धि करे । क्रमशः मननपर्यन्त इस साधन कि अच्छी तरह साधन कर लेने पर उसके द्वारा सालोक्य आदि के क्रम से धीरे-धीरे भगवान शिव का संयोग प्राप्त होता है । पहले सारे अंगो के रोग नष्ट हो जाते है । फिर सब प्रकार का लौकिक आनन्द विलीन हो जाता है ।
भगवान शंकर कि पुजा ,उनके नामो के जप तथा उनके गुण , रुप ,विलास और नामो का युक्ति परायण चित के द्वारा जो निरंतर परिशोधन या चिंतन होता है , उसी को मनन कहा गया है ; वह महेश्वर कि कृपा-दृष्टि से उपलब्ध होता है । उसे सब साधनो मे श्रेष्ठ या प्रधान कहा गया है ।
*हर हर महादेव*
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