आत्म रुदन........
हे मेरे नाथ.......
कैसे छूट पाएं
वो दाग
जिन्हें हरदम छुपाए रहते है
न जाने कितने
पापों को
दिल में दबाये रहते हैं
और फिर मौका मिलते ही.......
चुपके से कर देते है एक और दिखने की कोशिश करते हैं
कुछ वास्तव में हैं कुछ और
सूची बहुत लंबी है हमारे अपराधों की
कुछ भी सजा मिल सकती है हमें हमारे पापों की.......
इतना जानते हुए भीअपराध कर देते है..
आत्मा मना करती है मगरपाप कर देते हैं..........
और जीवन में सफलता कीआशा करते हैं
तुम्हारे प्रेम, करुणा, और कृपा कीअभिलाषा करते हैं
आपके सम्मुख,
आपके निकट होते हुए भी ये मन
ये शरीर क्यों विकृत हो जाता है
क्यों पापों में लिप्त हो जाता है
आपसे बातें,
आपकी बातें,
आपसे निवेदन,
आपसे प्रेम,
आपकी साधना, आराधना,
आपके पर आपका चिंतन,मननअध्ययन,
इसके उपरांत भीशरीर,मन और इंद्रियों मेंइतना विकार
इतने जघन्य कृत्य आपसे मिलने की
चाह भी
प्रार्थना भी,
निवेदन भी,
कुचेष्टाऐ भी
आह भी
सजा काटते हुए भी पुनरावृत्ति
ये विवेक की दुर्बलता है या दीन की परीक्षा है ,, हे मेरे नाथ,,,
हे मेरे नाथ.......
हे मेरे नाथ.......
कैसे छूट पाएं
वो दाग
जिन्हें हरदम छुपाए रहते है
न जाने कितने
पापों को
दिल में दबाये रहते हैं
और फिर मौका मिलते ही.......
चुपके से कर देते है एक और दिखने की कोशिश करते हैं
कुछ वास्तव में हैं कुछ और
सूची बहुत लंबी है हमारे अपराधों की
कुछ भी सजा मिल सकती है हमें हमारे पापों की.......
इतना जानते हुए भीअपराध कर देते है..
आत्मा मना करती है मगरपाप कर देते हैं..........
और जीवन में सफलता कीआशा करते हैं
तुम्हारे प्रेम, करुणा, और कृपा कीअभिलाषा करते हैं
आपके सम्मुख,
आपके निकट होते हुए भी ये मन
ये शरीर क्यों विकृत हो जाता है
क्यों पापों में लिप्त हो जाता है
आपसे बातें,
आपकी बातें,
आपसे निवेदन,
आपसे प्रेम,
आपकी साधना, आराधना,
आपके पर आपका चिंतन,मननअध्ययन,
इसके उपरांत भीशरीर,मन और इंद्रियों मेंइतना विकार
इतने जघन्य कृत्य आपसे मिलने की
चाह भी
प्रार्थना भी,
निवेदन भी,
कुचेष्टाऐ भी
आह भी
सजा काटते हुए भी पुनरावृत्ति
ये विवेक की दुर्बलता है या दीन की परीक्षा है ,, हे मेरे नाथ,,,
हे मेरे नाथ.......

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