Friday, July 20, 2018

श्रीगीतामाहात्म्य का अनुसंधान शौनक उवाच


गीतायाश्चैव माहात्म्यं यथावत्सूत मे वद।
पुराणमुनिना प्रोक्तं व्यासेन श्रुतिनोदितम्।।1।।

शौनक ऋषि बोलेः हे सूत जी ! अति पूर्वकाल के मुनि श्री व्यासजी के द्वारा कहा हुआ तथा श्रुतियों में वर्णित श्रीगीताजी का माहात्म्य मुझे भली प्रकार कहिए |(1)

सूत उवाच
पृष्टं वै भवता यत्तन्महद् गोप्यं पुरातनम्।
न केन शक्यते वक्तुं गीतामाहात्म्यमुत्तमम्।।2।।
सूत जी बोलेः आपने जो पुरातन और उत्तम गीतामाहात्म्य पूछा, वह अतिशय गुप्त है | अतः वह कहने के लिए कोई समर्थ नहीं है |(2)

कृष्णो जानाति वै सम्यक् क्वचित्कौन्तेय एव च।
व्यासो वा व्यासपुत्रो वा याज्ञवल्क्योऽथ मैथिलः।।3।।

गीता माहात्म्य को श्रीकृष्ण ही भली प्रकार जानते हैं, कुछ अर्जुन जानते हैं तथा व्यास, शुकदेव, याज्ञवल्क्य और जनक आदि थोड़ा-बहुत जानते हैं |(3)

अन्ये श्रवणतः श्रृत्वा लोके संकीर्तयन्ति च।
तस्मात्किंचिद्वदाम्यद्य व्यासस्यास्यान्मया श्रुतम्।।4।।

दूसरे लोग कर्णोपकर्ण सुनकर लोक में वर्णन करते हैं | अतः श्रीव्यासजी के मुख से मैंने जो कुछ सुना है वह आज कहता हूँ |(4)

गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रसंग्रहैः।
या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता।।5।।

जो अपने आप श्रीविष्णु भगवान के मुखकमल से निकली हुई है गीता अच्छी तरह कण्ठस्थ करना चाहिए | अन्य शास्त्रों के संग्रह से क्या लाभ?(5)

यस्माद्धर्ममयी गीता सर्वज्ञानप्रयोजिका।
सर्वशास्त्रमयी गीता तस्माद् गीता विशिष्यते।।6।।

गीता धर्ममय, सर्वज्ञान की प्रयोजक तथा सर्व शास्त्रमय है, अतः गीता श्रेष्ठ है |(6)

संसारसागरं घोरं तर्तुमिच्छति यो जनः।
गीतानावं समारूह्य पारं यातु सुखेन सः।।7।।

जो मनुष्य घोर संसार-सागर को तैरना चाहता है उसे गीतारूपी नौका पर चढ़कर सुखपूर्वक पार होना चाहिए |(7)

गीताशास्त्रमिदं पुण्यं यः पठेत् प्रयतः पुमान्।
विष्णोः पदमवाप्नोति भयशोकादिवर्जितः।।8।।

जो पुरुष इस पवित्र गीताशास्त्र को सावधान होकर पढ़ता है वह भय, शोक आदि से रहित होकर श्रीविष्णुपद को प्राप्त होता है |(8)

गीताज्ञानं श्रुतं नैव सदैवाभ्यासयोगतः।
मोक्षमिच्छति मूढात्मा याति बालकहास्यताम्।।9।।

जिसने सदैव अभ्यासयोग से गीता का ज्ञान सुना नहीं है फिर भी जो मोक्ष की इच्छा करता है वह मूढात्मा, बालक की तरह हँसी का पात्र होता है |(9)

ये श्रृण्वन्ति पठन्त्येव गीताशास्त्रमहर्निशम्।
न ते वै मानुषा ज्ञेया देवा एव न संशयः।।10।।

जो रात-दिन गीताशास्त्र पढ़ते हैं अथवा इसका पाठ करते हैं या सुनते हैं उन्हें मनुष्य नहीं अपितु निःसन्देह देव ही जानें |(10)

मलनिर्मोचनं पुंसां जलस्नानं दिने दिने।
सकृद् गीताम्भसि स्नानं संसारमलनाशनम्।।11।।

हर रोज जल से किया हुआ स्नान मनुष्यों का मैल दूर करता है किन्तु गीतारूपी जल में एक बार किया हुआ स्नान भी संसाररूपी मैल का नाश करता है |(11)

गीताशास्त्रस्य जानाति पठनं नैव पाठनम्।
परस्मान्न श्रुतं ज्ञानं श्रद्धा न भावना।।12।।
स एव मानुषे लोके पुरुषो विड्वराहकः।
यस्माद् गीतां न जानाति नाधमस्तत्परो जनः।।13।।

जो मनुष्य स्वयं गीता शास्त्र का पठन-पाठन नहीं जानता है, जिसने अन्य लोगों से वह नहीं सुना है, स्वयं को उसका ज्ञान नहीं है, जिसको उस पर श्रद्धा नहीं है, भावना भी नहीं है, वह मनुष्य लोक में भटकते हुए शूकर जैसा ही है | उससे अधिक नीच दूसरा कोई मनुष्य नहीं है, क्योंकि वह गीता को नहीं जानता है |

धिक् तस्य ज्ञानमाचारं व्रतं चेष्टां तपो यशः।
गीतार्थपठनं नास्ति नाधमस्तत्परो जन।।14।।

जो गीता के अर्थ का पठन नहीं करता उसके ज्ञान को, आचार को, व्रत को, चेष्टा को, तप को और यश को धिक्कार है | उससे अधम और कोई मनुष्य नहीं है |(14)

गीतागीतं न यज्ज्ञानं तद्विद्धयासुरसंज्ञकम्।
तन्मोघं धर्मरहितं वेदवेदान्तगर्हितम्।।15।।

जो ज्ञान गीता में नहीं गाया गया है वह वेद और वेदान्त में निन्दित होने के कारण उसे निष्फल, धर्मरहित और आसुरी जानें |

योऽधीते सततं गीतां दिवारात्रौ यथार्थतः।
स्वपन्गच्छन्वदंस्तिष्ठञ्छाश्वतं मोक्षमाप्नुयात्।।16।।

जो मनुष्य रात-दिन, सोते, चलते, बोलते और खड़े रहते हुए गीता का यथार्थतः सतत अध्ययन करता है वह सनातन मोक्ष को प्राप्त होता है |(16)

योगिस्थाने सिद्धपीठे शिष्टाग्रे सत्सभासु च।
यज्ञे च विष्णुभक्ताग्रे पठन्याति परां गतिम्।।17।।

योगियों के स्थान में, सिद्धों के स्थान में, श्रेष्ठ पुरुषों के आगे, संतसभा में, यज्ञस्थान में और विष्णुभक्तोंके आगे गीता का पाठ करने वाला मनुष्य परम गति को प्राप्त होता है |(17)

गीतापाठं च श्रवणं यः करोति दिने दिने।
क्रतवो वाजिमेधाद्याः कृतास्तेन सदक्षिणाः।।18।।

जो गीता का पाठ और श्रवण हर रोज करता है उसने दक्षिणा के साथ अश्वमेध आदि यज्ञ किये ऐसा माना जाता है |(18)

गीताऽधीता च येनापि भक्तिभावेन चेतसा।
तेन वेदाश्च शास्त्राणि पुराणानि च सर्वशः।।19।।

जिसने भक्तिभाव से एकाग्र, चित्त से गीता का अध्ययन किया है उसने सर्व वेदों, शास्त्रों तथा पुराणों का अभ्यास किया है ऐसा माना जाता है |(19)

यः श्रृणोति च गीतार्थं कीर्तयेच्च स्वयं पुमान्।
श्रावयेच्च परार्थं वै स प्रयाति परं पदम्।।20।।

जो मनुष्य स्वयं गीता का अर्थ सुनता है, गाता है और परोपकार हेतु सुनाता है वह परम पद को प्राप्त होता है |(20)

नोपसर्पन्ति तत्रैव यत्र गीतार्चनं गृहे।
तापत्रयोद्भवाः पीडा नैव व्याधिभयं तथा।।21।।

जिस घर में गीता का पूजन होता है वहाँ (आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक) तीन ताप से उत्पन्न होने वाली पीड़ा तथा व्याधियों का भय नहीं आता है | (21)

न शापो नैव पापं च दुर्गतिनं च किंचन।
देहेऽरयः षडेते वै न बाधन्ते कदाचन।।22।।

उसको शाप या पाप नहीं लगता, जरा भी दुर्गति नहीं होती और छः शत्रु (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर) देह में पीड़ा नहीं करते | (22)
 

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