हे गोपाल कृष्ण करूं आरती तेरी
हे प्रिया पति मैं करूं आरती तेरी
तुझपे तो कान्हा बलि बलि जाऊं सांझ सवेरे तेरे गुण गाऊं।
सरल श्रीकृष्ण भक्त नरसी महेता नानी बाई रो मायरो कथा (भाग 1 )
हे नाथ मैँ आपको भूलूँ नही...!! हे नाथ ! आप मेरे हृदय मेँ ऐसी आग लगा देँ कि आपकी प्रीति के बिना मै जी न सकूँ.
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
शांताकरम भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं, विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णँ शुभांगम।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगभिर्ध्यानिगम्यम। वंदे विष्णु भवभयहरणम् सर्वलोकैकनाथम॥
!! श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेवाय !!
ॐ
ओम नमः शिवाय
ईश्वर अंश जीव अविनाशी, चेतन अमल सहज सुख राशि
जय राम रमारमणं समनं | भव ताप भयाकुल पाहि जनं ||
अवधेस सुरेस रमेस विभो | सरनागत मागत पाहि प्रभो ||
गुन सील कृपा परमायतनं | प्रनमामि निरंतर श्रीरमणं |
दोहा:
बार बार बर मांगऊ हारिशी देहु श्रीरंग |
पदसरोज अनपायनी भागती सदा सतसंग ||
बरनी उमापति राम गुन हरषि गए कैलास |
तब प्रभु कपिन्ह दिवाए सब बिधि सुखप्रद बास||
नानी बाई रो मायरो’ गुजरात और राजस्थान का एक प्रसिद्ध लोक-आख्यान है‐ बीती तीन-चार सदियों में नरसी जी के जीवन के इस प्रसगं ने नरसी से अलग अपना एक स्वतंत्र चरित्र,एक स्वायत्त स्वरूप ग्रहण कर लिया‐ इस आख्यान को बार-बार रचने और तरह-तरह से कहने और गाने वालों में से बहुतों को पता भी नहीं है कि नरसिहं महेता भक्तिकालीन साहित्य के प्रसिद्ध कवि भी थे और उन्होंने ‘वैष्णव जन तो तेहेने कहिए, जे पीड परायी जाणे रे‐’ जैसे प्रसिद्ध पद की रचना की थी‐ आगे चलकर जिसे गुजरात के ही एक और महात्मा, महात्मा गाँधी ने अपनी प्रार्थना सभाओं में गाया था‐ लोक मे ‘नरसी जी का भात’ गाने वालों को इस बात से प्रायः लेना-देना नहीं है कि नरसी कवि थे या नही थे उन्हे तो लनेा-देना है नरसी नाम के उस गरीब पिता से जिसके पास अपनी बेटी की बेटी के विवाह में भात के चार कपड़े ले जाने लायक पूंजी भी नहीं थी और इस कारण उसे घोर तिरस्कार झेलना पडा़ था‐ इधर गांव मे अपने भाई-बंधुओं द्वारा उपहास उड़ाया जाना और उधर समधी पक्ष द्वारा अपमानजनक टिप्पणिया करते हुए उपहास उड़ाया जाना, लोक के कवि नरसी जी के जीवन की इस विडम्बना को अपने जीवन के बहुत करीब पाते है‐ यही वजह है कि वे ‘नरसी जी के भात’ के माध्यम से उस प्रताडऩा को बार-बार रचते हैं. जो उन्हें गरीबी के कारण पग-पग पर झेलनी पड़ती है‐ उस अपमान को कहते हैं जो उन्हें अपने श्रमषील और मानवीय जीवन के बावजदू केवल इसलिए झेलना पड़ता है कि उनके पास जमा-पूजी कुछ भी नहीं है‐ इस आख्यान की लेाक प्रियता का दूसरा कारण बेटियों से जुडा़ पहलू है‐ बेटियों को सुसराल में पीहर की गरीबी को लेकर जो ताने सुनने पडत़े है बात-बात में जो दबकर चलना, दबकर रहना पड़ता है, इतना दबकर कि वहा उनका अस्तित्व ही हंसी का पात्र हेा के रह जाता है‐ उनके व्यक्तित्व में किस कदर हीनता आ जाती है इसका अनुमान इस लोक-आख्यान में आने वाले इस प्रसगं से लगाया जा सकता है कि जब नरसी अपने निर्धन सधियो के साथ भात के लिए पहुचंते है तो उनकी बेटी उनसे कहती है-आप यहाँ क्यों आए, आपकी इस दशा में आना तो मेरा और अपमान होगा‐
जयश्री सरल राधिके रानीजी
श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेवाय


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